आदिल पाशा का उत्तराखंड कांग्रेस में बदले समीकरणों पर विस्तृत विश्लेषण!

देहरादून। उत्तराखंड कांग्रेस में पिछले एक हफ्ते के भीतर घटित घटनाओं ने प्रदेश की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है प्रदेश अध्यक्ष पद पर अचानक हुए बदलाव, चुनावी समितियों में चेहरों की नियुक्ति और वरिष्ठ नेता हरीश रावत की प्रतिक्रिया ने यह सवाल तेज़ कर दिया है कि क्या कांग्रेस की राजनीति में हरीश रावत का प्रभाव कमजोर पड़ रहा है? या यह सिर्फ एक रणनीतिक पुनर्संरचना है जिसमें पुराने समीकरणों को रीसेट किया जा रहा है?

परिदृश्य बदलने वाली सबसे बड़ी घटना

रानीखेत के पूर्व विधायक और युवा चेहरे के रूप में देखे जाने वाले करन महरा को हटाकर हाईकमान ने पूर्व अध्यक्ष गणेश गोदियाल को दोबारा प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया। इस निर्णय ने कई राजनीतिक संदेश दिए, खासकर इसलिए क्योंकि इस बार अध्यक्ष चुनने की प्रक्रिया में वरिष्ठ नेता हरीश रावत की कोई भूमिका स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं दी।

हरीश रावत: अनुभव, संघर्ष और बदलते समीकरण

हरीश रावत उत्तराखंड कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ चेहरों में से एक हैं पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व केंद्रीय मंत्री और लंबे समय से उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति के धुरी रहे हरीश रावत का प्रभाव वर्षों तक निर्विवाद रहा। उनकी सोशल मीडिया सक्रियता, जनता से जुड़ी छवि और चुनावों में उनका उपयोग कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा रहा है। लेकिन कांग्रेस संगठन में हालिया फेरबदल जिस दिशा को इंगित कर रहा है, वह साफ कहता है कि अब हाईकमान ने नये पावर सेंटर गढ़ दिए हैं और उनमें हरीश रावत की भूमिका सीमित होती दिख रही है।

अध्यक्ष कौन बने?

हरीश रावत की पसन्द और हाईकमान का निर्णय सूत्रों के अनुसार, हरीश रावत पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह को दोबारा अध्यक्ष बनवाने की कोशिश में थे लेकिन हाईकमान ने इस सुझाव को स्वीकार नहीं किया और इसके बजाय गणेश गोदियाल को प्रदेश अध्यक्ष बनाया।

यह घटनाक्रम कई संदेश देता है

पहली यह कि हरीश रावत की केंद्रीय नेतृत्व पर पकड़ पहले जैसी नहीं रही। कई बार देखा गया है कि वरिष्ठ नेता प्रदेश नेतृत्व चयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं लेकिन इस बार उनकी पसंद को नकार दिया गया।

दूसरी यह कि हाईकमान अपने भरोसेमंद, संयत और संतुलित नेताओं को आगे बढ़ा रहा है गणेश गोदियाल संगठनात्मक रूप से शांत माने जाते हैं उनकी नियुक्ति से यह भी संकेत मिला कि हाईकमान किसी भी गुटीय शक्ति केंद्र को मजबूत नहीं करना चाहता।

तीसरी यह कि जब प्रीतम सिंह को नहीं मिला अध्यक्ष पद, तो दिया एक और संकेत हरीश रावत की पसंद तो प्रीतम सिंह थे, लेकिन हाईकमान ने प्रीतम सिंह को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाया। एक ऐसा पद जो महत्वपूर्ण तो है, पर संगठनात्मक नियंत्रण से दूर है यह पद सम्मानजनक समायोजन तो है, पर प्रदेश अध्यक्ष जैसे निर्णायक पद की तुलना में इसका महत्व सीमित है यह भी दर्शाता है कि हाईकमान हरीश रावत द्वारा सुझाए गए फ्रेमवर्क के भीतर निर्णय लेने के लिए बाध्य नहीं है।

हरक सिंह रावत की वापसी सबसे बड़ा राजनीतिक संकेत

2016 में राज्य की कांग्रेस सरकार गिरने के लिए हरीश रावत ने जिस व्यक्ति को सबसे अधिक जिम्मेदार ठहराया था, वहीं हरक सिंह रावत कांग्रेस चुनाव मैनेजमेंट कमेटी के चेयरमैन बना दिए गए।यह नियुक्ति हरीश रावत की राजनीति के प्रभाव को लगभग प्रत्यक्ष रूप से चुनौती देती है।

करीबी दुश्मन को ताकत मिलना सबसे बड़ा झटका

हरीश रावत और हरक सिंह की अदावत सिर्फ राजनीतिक मतभेद नहीं, बल्कि व्यक्तिगत स्तर तक गहरी मानी जाती है ऐसे व्यक्ति को चुनाव प्रबंधन का प्रमुख बनाना यह दिखाता है कि हाईकमान अब प्रायोगिक राजनीति चल रहा है, पुरानी दुश्मनियों को गौण रखते हुए।

सोशल मीडिया संकेत..क्या यह नाराज़गी है या चुप्पी का संदेश?

हरीश रावत सोशल मीडिया पर सबसे अधिक सक्रिय नेताओं में हैं दिन में कई पोस्ट, राजनीतिक टिप्पणियाँ, पहाड़ से जुड़े फोटो और अपनी व्यक्तिगत गतिविधियों को साझा करना उनकी पहचान रही है लेकिन इस बार हैरानी हुई:।

● गणेश गोदियाल को अध्यक्ष बनाए जाने के कई घंटे बाद तक उन्होंने कोई पोस्ट नहीं किया वो भी तब जब बाकी कांग्रेस नेताओं की ओर से बधाइयों की बाढ़ लग चुकी थी।

● अंततः उन्होंने वही पोस्ट तब किया जब गणेश गोदियाल खुद उनके घर पहुँचकर उनके पैर छूकर आशीर्वाद ले आए यह किसी भी वरिष्ठ नेता के लिए असामान्य व्यवहार है और संकेत देता है कि वे बदलाव से उत्साहित नहीं हैं।

फेसबुक पर किसी भी उत्तराखंड कांग्रेसी नेता को फॉलो न करना एक और बड़ा संकेत

हरीश रावत अपने फेसबुक अकाउंट से उत्तराखंड के किसी भी कांग्रेस नेता को फॉलो नहीं कर रहे यहाँ तक कि प्रभारी कुमारी शैलजा को भी नहीं यह सोशल मीडिया गतिविधि राजनीतिक संदेश देती है।

दो संभावनाएँ बनती हैं

हरीश रावत अपनी नाराज़गी को प्रत्यक्ष रूप से नहीं कहकर संकेतों में व्यक्त कर रहे हैं या वह बेहद खफा हैं दोनों ही स्थिति कांग्रेस के भीतर भविष्य की ध्रुवीयता बढ़ा सकती हैं।

क्या हाईकमान सचमुच हरीश रावत को ‘हाशिये पर’ भेज रहा है?

परिदृश्य को जोड़कर देखें तो चार स्पष्ट संदेश निकलते हैं:

1. संगठनात्मक नेतृत्व में उनका असर कम हो रहा है, प्रीतम सिंह को अध्यक्ष नहीं बनवाना इसका बड़ा उदहारण है।

2. उनके राजनीतिक प्रतिद्वंदी को बड़ी जिम्मेदारी देनाहरक सिंह को चुनाव प्रबंधन की बागडोर सौंपना एक निर्णायक कदम है।

3. बदलाव पर उनकी सीमित प्रतिक्रियावरिष्ठ होने के बावजूद वह खुद बदलाव की घोषणा के केंद्र में नहीं दिखे।

4. पार्टी के शीर्ष रणनीतिक स्तर में उनकी भूमिका अब परामर्शदात्री तक सीमित हो सकती है।

ये ज़रूर कहा जा सकता है कि हरीश रावत अभी भी बड़े नेता हैं, लेकिन निर्णायक नहीं।

9 thoughts on “देहरादून से दिल्ली तक…क्या कांग्रेस में हरीश रावत का प्रभाव हो रहा कम?”
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