
देहरादून। राजकीय दून चिकित्सालय में नवजात मृत्यु दर (Neonatal Mortality Rate) को कम करने और आदर्श चिकित्सा प्रोटोकॉल का शत-प्रतिशत अनुपालन सुनिश्चित करने के उद्देश्य से आयोजित उच्चस्तरीय बैठक में बहुआयामी रणनीति पर चर्चा की गई। बैठक में स्त्री एवं प्रसूति रोग, शिशु रोग तथा इमरजेंसी मेडिसिन विभाग के वरिष्ठ चिकित्सकों, फैकल्टी और जूनियर रेज़िडेंट्स ने भाग लिया।
LaQshya सर्टिफिकेशन की दिशा में पहल एच ओ डी, स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग डॉ. वंदना बिष्ट ने जानकारी दी कि जीडीएमसी को LaQshya (Labour Room Quality Improvement Initiative) सर्टिफाइड बनाने हेतु मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) देहरादून से औपचारिक पत्राचार किया जा चुका है।
उन्होंने कहा कि LaQshya प्रमाणन से लेबर रूम और ऑपरेशन थिएटर की गुणवत्ता, संक्रमण नियंत्रण, आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली और मातृ-नवजात सुरक्षा मानकों में संरचनात्मक सुधार सुनिश्चित होगा। यह पहल सुरक्षित मातृत्व और सुरक्षित नवजात देखभाल की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
6-मासिक नवजात संजीवन प्रशिक्षण अनिवार्यHOD, शिशु रोग विभाग डॉ. अशोक ने स्पष्ट किया कि स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग के सभी पीजी छात्रों के लिए हर छह माह में नवजात संजीवन (Neonatal Resuscitation) प्रशिक्षण अनिवार्य किया गया है।उन्होंने कहा कि डिलीवरी के समय उपस्थित प्रत्येक चिकित्सक को रेसुसिटेशन की दक्षता होनी चाहिए, ताकि जन्म के प्रथम मिनट में ही आवश्यक हस्तक्षेप किया जा सके। सिमुलेशन-आधारित ट्रेनिंग और कौशल मूल्यांकन को नियमित रूप से लागू किया जाएगा।
Patient Safety और गैप एनालिसिस पर जोरPatient Safety India के GDMC नोडल अधिकारी एवं HOD, इमरजेंसी मेडिसिन डॉ. नंदन सिंह बिष्ट ने हाल ही में आयोजित उत्तराखंड चैप्टर वेबिनार का हवाला देते हुए कहा कि SOP के अनुपालन में आ रही व्यावहारिक चुनौतियों का गैप एनालिसिस किया जाना अनिवार्य है।उन्होंने सुझाव दिया कि—
•विभागवार SOP अनुपालन की नियमित ऑडिटिंग हो।
डिलीवरी रूम से NICU ट्रांसफर तक की प्रक्रिया का समयबद्ध मूल्यांकन किया जाए।
•मॉर्टेलिटी रिव्यू मीटिंग में सुधारात्मक कदमों की मॉनिटरिंग सुनिश्चित हो।प्राचार्या का मार्गदर्शनप्राचार्या डॉ. गीता जैन, जो स्वयं वरिष्ठ गायनेकोलॉजिस्ट हैं, ने कहा कि सुरक्षित प्रसव और नवजात जीवन की रक्षा एक साझा जिम्मेदारी है। हाई-रिस्क गर्भावस्था की पूर्व पहचान, प्रसव के दौरान सतर्क मॉनिटरिंग और जन्म के बाद गोल्डन आवर प्रबंधन से अधिकांश जटिलताओं को रोका जा सकता है।उन्होंने सिंगल डिजिट तक मोर्टेलिटी दर हासिल करने पर चिकित्सकों की सराहना भी है उन्होंने दोहराया कि प्रत्येक नवजात जीवन की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और किसी भी स्तर पर प्रोटोकॉल में शिथिलता स्वीकार्य नहीं होगी।
बैठक में उपस्थित HOD, स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग डॉ. वंदना बिष्ट HOD, शिशु रोग विभाग डॉ.अशोक HOD, इमरजेंसी मेडिसिन विभाग डॉ. नंदन सिंह बिष्टसहित दोनों विभागों के सभी फैकल्टी सदस्य और जूनियर रेज़िडेंट्स उपस्थित रहे।
बैठक का निष्कर्ष यही रहा कि यदि LaQshya सर्टिफिकेशन, सख्त प्रोटोकॉल अनुपालन, नियमित 6-मासिक नवजात संजीवन प्रशिक्षण, गैप एनालिसिस और विभागीय समन्वय को प्रभावी रूप से लागू किया जाए, तो नवजात मृत्यु दर में उल्लेखनीय और स्थायी कमी लाई जा सकती है।
