देहरादून। दून मेडिकल कॉलेज, देहरादून के फॉरेंसिक मेडिसिन एवं टॉक्सिकोलॉजी विभाग द्वारा आज एक दिवसीय सतत चिकित्सा शिक्षा (Continuing Medical Education – CME) कार्यक्रम का आयोजन किया गया कार्यक्रम का विषय था “Forensic Evidence: From Crime Scene to Autopsy to Courtroom”, जिसका उद्देश्य अपराध स्थल से लेकर न्यायालय तक फॉरेंसिक साक्ष्यों की श्रृंखला को समझना तथा विभिन्न विभागों के बीच समन्वय को मजबूत करना था।

कार्यक्रम का शुभारम्भ दीप प्रज्वलन एवं वंदे मातरम् के साथ हुआ, विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. नीरज कुमार ने स्वागत भाषण देते हुए कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की और बताया कि फॉरेंसिक साक्ष्य अक्सर विशेषज्ञता होने के बावजूद व्यावहारिक चुनौतियों के कारण न्यायिक प्रक्रिया में कमजोर पड़ जाते हैं इस CME का उद्देश्य पुलिस, चिकित्सकों, फॉरेंसिक वैज्ञानिकों और विधि विशेषज्ञों के बीच बेहतर समझ विकसित करना है।

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि (Guest of Honour) उत्तराखण्ड के पूर्व पुलिस महानिदेशक श्री अशोक कुमार (IPS) थे, जिन्होंने अपने संबोधन में अपराध अन्वेषण में वैज्ञानिक साक्ष्यों की बढ़ती भूमिका और विभिन्न एजेंसियों के समन्वय की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।वैज्ञानिक सत्रों में विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने अपने अनुभव साझा किए। पहले सत्र में डॉ. निलेश आनंद भरने, आईजी एसटीएफ एवं निदेशक, एफएसएल देहरादून ने अपराध स्थल संरक्षण, साक्ष्य के कोन्टामिनेशन और जांच की व्यावहारिक चुनौतियों पर चर्चा की।

दूसरे सत्र में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. विवेक मंगरे (राजकीय दून मेडिकल कॉलेज) तथा प्रो. डॉ. नीरज कुमार ने अस्पताल स्तर पर चिकित्सकीय साक्ष्य, चोटों की व्याख्या, परीक्षण के समय तथा दस्तावेज़ीकरण में आने वाली वास्तविक समस्याओं पर प्रकाश डाला।

इसके पश्चात डॉ. मोनिका नेगी, वैज्ञानिक अधिकारी, एफएसएल देहरादून ने फॉरेंसिक प्रयोगशाला की क्षमताओं और सीमाओं के बारे में विस्तार से बताया। वन्यजीव अपराधों पर आयोजित सत्र में डॉ. एस.के. गुप्ता, साइंटिस्ट–F, वाइल्डलाइफ फॉरेंसिक्स, देहरादून तथा डॉ. चंद्र प्रकाश शर्मा, प्रिंसिपल टेक्निकल ऑफिसर, वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने वन्यजीव अपराध जांच और प्रजाति पहचान की वैज्ञानिक प्रक्रियाओं को समझाया।

न्यायालय में चिकित्सकीय साक्ष्य की भूमिका पर अधिवक्ता जावेद अहमद, अभियोजक, देहरादून ने महत्वपूर्ण व्यावहारिक सुझाव दिए तथा बताया कि अदालतें चिकित्सकीय रिपोर्टों को किस प्रकार पढ़ती और परखती हैं।कार्यक्रम के दौरान एक केस आधारित पैनल चर्चा भी आयोजित की गई जिसका संचालन डॉ. वल्लीअप्पन एस., एसोसिएट प्रोफेसर, VCSGGMSRI श्रीनगर ने किया।

पैनल में परवेज अली (DySP, एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स, STF), प्रो. डॉ. संजय दास (हेड, फॉरेंसिक मेडिसिन, HIMS जॉली ग्रांट), डॉ. एस.के. शर्मा (जॉइंट डायरेक्टर, FSL उत्तराखण्ड), डॉ. चंद्र प्रकाश शर्मा तथा ममता मानदुली (सीनियर प्रोसिक्यूशन ऑफिसर, उत्तराखण्ड) ने भाग लिया और यह चर्चा की कि फॉरेंसिक साक्ष्यों की श्रृंखला किन कारणों से टूट जाती है।

इस दौरान कई मुद्दों पर गरमागरम बहस हुई। साथ ही एमबीबीएस के छात्रों द्वारा एक ज्ञानवर्धक फॉरेंसिक हास्य नाटिका प्रस्तुत की गई, जिसमें रोचक और व्यंग्यात्मक शैली में अपराध स्थल से लेकर पोस्टमार्टम और न्यायालय तक फॉरेंसिक साक्ष्यों की महत्ता को दर्शाया गया। इस प्रस्तुति ने उपस्थित सभी प्रतिभागियों को शिक्षित करने के साथ-साथ वातावरण को भी जीवंत बना दिया। कॉलेज की प्राचार्य प्रो. डॉ. गीता जैन ने कहा कि इस प्रकार के अंतर विभागीय कार्यक्रम चिकित्सा, पुलिस और न्यायिक तंत्र के बीच समन्वय को मजबूत करते हैं।

वहीं निदेशक चिकित्सा शिक्षा, उत्तराखण्ड प्रो. डॉ. अजय आर्या ने भी इस पहल की सराहना करते हुए इसे चिकित्सा शिक्षा और न्याय व्यवस्था के लिए उपयोगी बताया।कार्यक्रम के दौरान एमबीबीएस छात्रों द्वारा प्रस्तुत ज्ञानवर्धक फॉरेंसिक हास्य नाटिका भी आकर्षण का केंद्र रही। इस CME के सफल आयोजन में फॉरेंसिक मेडिसिन विभाग के पीजी विद्यार्थियों तथा स्टाफ सदस्यों के उल्लेखनीय प्रयास रहे, जिनके समन्वित कार्य से कार्यक्रम सुचारु रूप से संपन्न हुआ।कार्यक्रम में डॉक्टरों, पुलिस अधिकारियों, फॉरेंसिक वैज्ञानिकों, विधि विशेषज्ञों तथा मेडिकल छात्रों ने सक्रिय भागीदारी की।

अंत में प्रतिभागियों के साथ संवादात्मक सत्र आयोजित किया गया तथा कार्यक्रम के समापन पर भविष्य में आयोजित होने वाले CME – Part II की घोषणा भी की गई।प्रतिभागियों ने कार्यक्रम में बड़े उत्साह के साथ भाग लिया, और इस पहल की काफी सराहना की। फॉरेंसिक मेडिसिन विभाग के अनुसार इस प्रकार के कार्यक्रम अपराध जांच और न्यायिक प्रक्रिया में वैज्ञानिक साक्ष्यों की गुणवत्ता सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

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